
मयूरभंज (ओडिशा)मयूरभंज जिले के झोराडीह में रविवार को विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर ऑल इंडिया सरना धर्म चेमेद आसरा की ओर से भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। समारोह में ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान आदिवासी समाज की पारंपरिक संस्कृति, धार्मिक मान्यताओं, भाषा, इतिहास और सामाजिक पहचान के संरक्षण को लेकर विस्तार से चर्चा की गई।

समारोह में वक्ताओं ने कहा कि आधुनिकता और डिजिटल युग के बढ़ते प्रभाव के बीच आदिवासी समाज की पारंपरिक जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत तेजी से प्रभावित हो रही है। ऐसे समय में अपनी जड़ों, परंपराओं और सामाजिक पहचान को बचाए रखना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
संगठन की अध्यक्ष हीरामनी मुर्मू ने कहा कि आदिवासी समाज की जीवनशैली हमेशा से प्रकृति के बेहद करीब रही है। पहले गांवों में लकड़ी की ढेंकी से धान कूटकर चावल तैयार किया जाता था। लकड़ी जलाकर भोजन बनाया जाता था और राख का इस्तेमाल कपड़े धोने जैसे घरेलू कार्यों में किया जाता था।
उन्होंने कहा कि शादी-विवाह और अन्य सामाजिक आयोजनों में ढोल-नगाड़ों के साथ सामूहिक गीत और नृत्य की समृद्ध परंपरा रही है। लेकिन आधुनिक जीवनशैली और तकनीक के बढ़ते प्रभाव के कारण इन पारंपरिक गतिविधियों का चलन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। उन्होंने समाज के लोगों से अपनी पुरानी परंपराओं को संरक्षित करने और नई पीढ़ी को उससे जोड़ने की अपील की।
संगठन के उपाध्यक्ष निड़ोमुनी मुर्मू ने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी सादगी, प्रकृति से जुड़ाव और सामुदायिक जीवन में निहित है। उन्होंने कहा कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मातृभाषा, संस्कृति, परंपरा और सामाजिक पहचान को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए प्रयास करना चाहिए।
वहीं, झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के डुमरिया प्रखंड अंतर्गत लखाईडीह गांव निवासी सरना धर्म के अगुवा सह ग्राम प्रधान कान्हुराम टुडू ने आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के जाहेरथान भी कई स्थानों पर उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। कई जगहों पर जाहेरथान की पहचान तक मुश्किल होती जा रही है।
उन्होंने कहा कि पारंपरिक पूजा-पद्धति, धार्मिक मान्यताओं और सामुदायिक धार्मिक स्थलों का संरक्षण बेहद जरूरी है। उन्होंने समाज के लोगों से अपने इतिहास और संस्कृति का अध्ययन करने की अपील करते हुए कहा कि किसी भी समाज के मजबूत भविष्य के लिए अपने अतीत और इतिहास को जानना आवश्यक है।
कान्हुराम टुडू ने कहा कि अपनी जड़ों, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत की समझ समाज को मजबूत आधार प्रदान करती है। यदि नई पीढ़ी अपने इतिहास और परंपराओं से जुड़ी रहेगी, तभी आदिवासी समाज की विशिष्ट पहचान लंबे समय तक कायम रह सकेगी।
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने यह भी कहा कि आधुनिकता और तकनीक से पूरी तरह दूर रहना समाधान नहीं है। समाज को समय के साथ आगे बढ़ने के साथ-साथ अपनी भाषा, संस्कृति, धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और प्रकृति आधारित जीवन-पद्धति को भी सुरक्षित रखना होगा।
युवा पीढ़ी को सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने पर विशेष जोर देते हुए वक्ताओं ने कहा कि बच्चों और युवाओं को अपनी भाषा, लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक रीति-रिवाज, इतिहास और धार्मिक परंपराओं के बारे में जानकारी देना आवश्यक है।
समारोह में बुढान सोरेन, निड़ोमुनी मुर्मू, उकील मुर्मू, सुकेन हांसदा, जागेश्वर सोरेन, श्रीमती भानुमति मुर्मू सहित ऑल इंडिया सरना धर्म चेमेद आसरा के पदाधिकारी एवं सदस्य मौजूद रहे। इसके अलावा ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल से पहुंचे बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोगों ने कार्यक्रम में भाग लिया।
कार्यक्रम के अंत में आदिवासी समाज की भाषा, संस्कृति, परंपरा, धार्मिक पहचान और ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने तथा इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का सामूहिक संकल्प लिया गया। समारोह ने आदिवासी समाज की सांस्कृतिक एकजुटता और अपनी पहचान को बचाने के प्रति प्रतिबद्धता का संदेश दिया।




