चाईबासा में शिबू सोरेन की प्रतिमा स्थापना का विरोध, स्थानीय शहीदों को प्राथमिकता देने की मांग

चाईबासा: चाईबासा में पद्मश्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन की आदमकद प्रतिमा स्थापित किए जाने के प्रस्ताव का ईचा-खरकई बांध विरोधी संघ ने विरोध किया है। संघ के अध्यक्ष एवं अधिवक्ता वीरसिंह बुड़ीउली ने कहा कि शिबू सोरेन झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेताओं में रहे हैं और राज्य गठन में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है, लेकिन चाईबासा में प्रतिमा स्थापना के लिए स्थानीय वीर शहीदों और महापुरुषों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि कोल्हान की अपनी अलग ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान है। इस क्षेत्र ने ऐसे अनेक वीर योद्धा और महापुरुष दिए हैं जिन्होंने झारखंडी अस्मिता, समाज और संस्कृति की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उनका कहना है कि स्थानीय इतिहास और बलिदानियों की अनदेखी उचित नहीं होगी।
वीरसिंह बुड़ीउली ने सेरेंगसिया विद्रोह के वीर शहीद पोटो हो, नारा हो, बड़ाए हो, भुगतनी हो, पांडुवा हो, देवी हो और केरसे मुंडा का उल्लेख करते हुए कहा कि इन महान योद्धाओं की प्रतिमाएं स्थापित कर नई पीढ़ी को उनके संघर्ष और बलिदान से परिचित कराया जाना चाहिए। उन्होंने ईचा डैम विरोधी आंदोलन के शहीद गंगाराम कालुंडिया, हो समाज के साहित्यकार एवं दार्शनिक लाको बोदरा तथा टाटा कॉलेज के संस्थापक पीसी बिरुवा को भी कोल्हान की महत्वपूर्ण पहचान बताया।
संघ ने मांग की है कि यदि चाईबासा में किसी महापुरुष की प्रतिमा स्थापित की जानी है तो स्थानीय वीर सपूतों और शहीदों को प्राथमिकता दी जाए, ताकि क्षेत्र के इतिहास, संस्कृति और बलिदान की विरासत को सम्मान मिल सके।
वीरसिंह बुड़ीउली ने आरोप लगाया कि झारखंड मुक्ति मोर्चा की जिला कमेटी स्थानीय शहीदों और महापुरुषों की उपेक्षा कर रही है। उन्होंने कहा कि प्रतिमा स्थापना जैसे महत्वपूर्ण निर्णय स्थानीय इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और जनभावनाओं को ध्यान में रखकर लिए जाने चाहिए।




