चाईबासा: “कथित चोरी के जनादेश से बने कानून जनता पर नहीं थोपे जा सकते” — बुधराम लागुरी
झामुमो जिला प्रवक्ता ने MMDR संशोधन कानून और केंद्र की नीतियों पर उठाए सवाल, व्यापक जनसंवाद और संसदीय समीक्षा की मांग

चाईबासा: झामुमो जिला प्रवक्ता बुधराम लागुरी ने केंद्र सरकार की नीतियों और MMDR संशोधन कानून को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि जिन कानूनों के निर्माण को लेकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया और जनादेश की पारदर्शिता पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उनकी समीक्षा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जनता के अधिकारों को प्रभावित करने वाले कानूनों पर व्यापक चर्चा जरूरी है।
चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर सवाल
बुधराम लागुरी ने कहा कि विपक्ष लगातार चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़े मुद्दे उठा रहा है। उनके अनुसार, ऐसे सवालों पर केंद्र सरकार को जवाब देना चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार के कुछ फैसलों का असर राज्यों के अधिकारों और संघीय व्यवस्था पर पड़ रहा है। इसी संदर्भ में उन्होंने MMDR कानून को रद्द करने की मांग की।
MMDR कानून की समीक्षा की मांग
बुधराम लागुरी ने कहा कि जिस जनादेश की वैधता को लेकर जनता और विपक्ष सवाल उठा रहे हैं, उसके आधार पर बनाए गए विवादित कानूनों की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि कोई कानून जनता, राज्यों या संविधान में निहित अधिकारों के विपरीत पाया जाता है, तो उसमें संशोधन या उसे समाप्त करने पर विचार किया जाना चाहिए।
झारखंड के खनिज हितों की रक्षा की बात
उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य के बीच अधिकारों का संतुलन भारतीय संघीय व्यवस्था की महत्वपूर्ण विशेषता है। खनिज संपदा से समृद्ध झारखंड में खनिज संसाधनों और उनसे जुड़े राजस्व को लेकर राज्य के हितों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।
बुधराम लागुरी ने कहा कि जल, जंगल, जमीन और खनिज संपदा से जुड़े झारखंड के हितों की रक्षा के लिए झामुमो लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाता रहेगा।
“कानून जनता के लिए होते हैं”
बुधराम लागुरी ने कहा, “कानून जनता के लिए होते हैं, जनता कानून के लिए नहीं।” उन्होंने कहा कि यदि किसी कानून से जनता, राज्यों या संविधान के अधिकार प्रभावित होते हैं तो उसके खिलाफ लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से सवाल उठाना विपक्ष और जनता का अधिकार है।
उन्होंने केंद्र सरकार से MMDR समेत विवादित कानूनों पर व्यापक जनसंवाद और संसदीय समीक्षा की मांग की।




