
चाईबासा:प्रकाश गुप्ता: कोरोना संक्रमण के दौरान इलाज पर हुए खर्च का बीमा दावा खारिज करना बजाज एलियांज जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को महंगा पड़ गया। पश्चिमी सिंहभूम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, चाईबासा ने सीसी केस संख्या 08/2025 में शिकायतकर्ता रंजिता पॉल के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बीमा कंपनी को कुल 7.10 लाख रुपये भुगतान करने का आदेश दिया है।

आयोग के आदेश के अनुसार कंपनी को 6 लाख रुपये बीमा दावा राशि, 1 लाख रुपये मानसिक प्रताड़ना एवं उत्पीड़न के मुआवजे तथा 10 हजार रुपये मुकदमा खर्च के रूप में देने होंगे। आदेश का पालन 45 दिनों के भीतर करना होगा। निर्धारित अवधि के बाद भुगतान करने पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
मामले में चाईबासा के बंधपाड़ा निवासी रंजिता पॉल ने बजाज एलियांज जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के खिलाफ उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रणब कुमार दरिपा और श्वेता पुरोहित ने पक्ष रखा।
मामले के अनुसार रंजिता पॉल ने बजाज एलियांज की स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी ली थी। अप्रैल 2021 में कोरोना संक्रमित होने के बाद उन्हें गंभीर सांस लेने की समस्या हुई। 18 अप्रैल को उन्हें कोलकाता के गुड समैरिटन अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 1 मई तक इलाज चला। इसके बाद 2 मई से 5 मई तक रेपोस क्लिनिक एंड रिसर्च सेंटर में उपचार कराया गया।
शिकायतकर्ता के अनुसार अस्पताल, दवा और अन्य उपचार पर कुल 6,34,530 रुपये खर्च हुए। इसके बाद उन्होंने बीमा कंपनी के समक्ष दावा प्रस्तुत किया। हालांकि, स्वतंत्र जांच के बाद बीमा कंपनी ने अस्पताल के कथित असहयोग, इलाज के मानकों, डॉक्टर से संबंधित कुछ विसंगतियों, इन-हाउस फार्मेसी तथा बिल और पर्चियों की उपलब्धता को लेकर सवाल उठाते हुए 12 मई 2022 को दावा खारिज कर दिया।
मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने कहा कि बीमा कंपनी द्वारा नियुक्त जांचकर्ता की रिपोर्ट मात्र किसी बीमा दावे को फर्जी, कपटपूर्ण या अपात्र साबित करने का निर्णायक प्रमाण नहीं हो सकती। जांच रिपोर्ट को अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के साथ देखा जाना आवश्यक है।
आयोग ने कहा कि केवल अस्पताल द्वारा जांचकर्ता को सहयोग नहीं करने, डॉक्टर से मुलाकात नहीं होने या कुछ दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने के आधार पर पूरे बीमा दावे को खारिज नहीं किया जा सकता। बीमा कंपनी की ओर से यह साबित करने के लिए कोई स्वतंत्र विशेषज्ञ चिकित्सकीय साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं किया गया कि शिकायतकर्ता का इलाज फर्जी, अनावश्यक या कोरोना संक्रमण से असंबंधित था।
आयोग ने यह भी माना कि शिकायतकर्ता की ओर से अस्पताल के बिल, भुगतान रसीदें, मेडिकल दस्तावेज और दवाओं की रसीदें प्रस्तुत की गई थीं। ऐसे में पूरे दावे को एक साथ खारिज करना उचित नहीं था। यदि किसी विशेष खर्च पर आपत्ति थी, तो बीमा कंपनी को दावा मदवार जांच कर केवल अपात्र राशि को अस्वीकार करना चाहिए था।
वहीं, मामले में शामिल केनरा बैंक, चाईबासा शाखा के खिलाफ आयोग ने स्वतंत्र रूप से किसी सेवा-कमी को प्रमाणित नहीं पाया। इसलिए बैंक के विरुद्ध शिकायत खारिज कर दी गई।
उपभोक्ता आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि केवल संदेह या अपूर्ण जांच के आधार पर किसी वैध बीमा दावे को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। बीमा कंपनी को दावा खारिज करने के लिए पॉलिसी की किसी विशिष्ट शर्त या अपवर्जन का ठोस आधार और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करना आवश्यक है।




