
जमशेदपुर:- भारत के इतिहास में वीरता और त्याग की ऐसी अनेक गाथाएं दर्ज हैं, जो समय बीतने के साथ और भी प्रेरणादायी बनती जाती हैं। नीरजा भनोट की कहानी भी साहस, कर्तव्यनिष्ठा और मानवीय संवेदना की ऐसी ही असाधारण मिसाल है। महज 22 वर्ष की उम्र में अपने प्राणों की आहुति देकर सैकड़ों यात्रियों की जान बचाने वाली नीरजा आज भी देश की बेटियों के लिए साहस, आत्मविश्वास और कर्तव्यपरायणता की प्रेरणा हैं। उनके बलिदान दिवस पर देश उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ याद करता है।
चंडीगढ़ में हुआ जन्म, मुंबई में पूरी हुई शिक्षा
नीरजा भनोट का जन्म 7 सितंबर 1963 को चंडीगढ़ में हुआ था। उनके पिता हरीश भनोट पत्रकार थे, जबकि उनकी माता रमा भनोट गृहिणी थीं। बाद में उनका परिवार मुंबई में बस गया, जहां नीरजा ने अपनी शिक्षा पूरी की।
नीरजा बेहद आत्मविश्वासी, संवेदनशील और प्रतिभाशाली युवती थीं। उन्होंने मॉडलिंग के क्षेत्र में भी काम किया, लेकिन बाद में विमान परिचारिका के रूप में अपना करियर चुना और पैन एम एयरलाइन से जुड़ गईं।
5 सितंबर 1986 की वह भयावह रात
5 सितंबर 1986 की रात नीरजा भनोट पैन एम की फ्लाइट संख्या 73 में वरिष्ठ विमान परिचारिका के रूप में तैनात थीं। यह विमान मुंबई से न्यूयॉर्क जा रहा था और कराची में उसका ठहराव था।
कराची हवाई अड्डे पर विमान के उतरने के कुछ ही समय बाद सशस्त्र आतंकवादियों ने विमान को अपने कब्जे में ले लिया। विमान में बड़ी संख्या में यात्री और चालक दल के सदस्य मौजूद थे। स्थिति बेहद तनावपूर्ण थी।
विमान के भारतीय पायलटों को जैसे ही घटना की जानकारी मिली, उन्होंने कॉकपिट से निकलकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित की। इसके बाद यात्रियों और चालक दल के सदस्यों की जिम्मेदारी नीरजा समेत केबिन क्रू पर आ गई।
आतंकियों के सामने नहीं खोया धैर्य
ऐसे भयावह हालात में भी नीरजा ने अपना धैर्य नहीं खोया। उन्होंने यात्रियों को शांत रखने और उन्हें सुरक्षित रखने का प्रयास जारी रखा।
आतंकवादियों ने यात्रियों के पासपोर्ट इकट्ठा करने का आदेश दिया था, ताकि अमेरिकी नागरिकों की पहचान की जा सके। नीरजा ने खतरे को समझते हुए कई अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छिपाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे आतंकवादियों के लिए उनकी पहचान करना मुश्किल हुआ और कई यात्रियों की जान बचाने में मदद मिली।
17 घंटे तक चला आतंकियों का कब्जा
करीब 17 घंटे तक विमान आतंकवादियों के कब्जे में रहा। अंततः विमान की बिजली व्यवस्था समाप्त हो गई। अंधेरे का फायदा उठाकर यात्रियों को विमान से बाहर निकलने का अवसर मिला।
नीरजा ने अपनी सुरक्षा की चिंता किए बिना यात्रियों को आपातकालीन निकास की ओर भेजना शुरू किया। वह लगातार लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने में जुटी रहीं।
इसी दौरान उन्हें पता चला कि कुछ बच्चे अभी भी विमान के भीतर मौजूद हैं। अपनी जान की परवाह किए बिना नीरजा दोबारा विमान के अंदर गईं और बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालने में मदद की।
मानवता के लिए अमर हो गया बलिदान
यात्रियों की जान बचाने की कोशिश में नीरजा भनोट ने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। उनकी बहादुरी और मानवीय संवेदना ने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया।
नीरजा भनोट को उनके अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए भारत सरकार ने मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया। वह यह सम्मान पाने वाली सबसे कम उम्र की महिलाओं में एक बनीं।
नीरजा की कहानी सिर्फ एक विमान परिचारिका के साहस की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी इंसानियत और कर्तव्य को सर्वोपरि रखा जा सकता है।
उनका जीवन और बलिदान आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।
शत्-शत् नमन।
— वरुण कुमार
लेखक एवं कवि




